Maha Shivratri : कब है महा शिवरात्रि ? जानिए महत्व, निशीथ काल पूजा विधि एवं शुभ मुहूर्त

Maha shivratri Image Happy Maha shivartri
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महा शिवरात्रि – Maha Shivaratri

शिव यानि कल्याणकारी, बाबा भोलेनाथ,  शिवशंकर, शिवशम्भू, शिवजी, नीलकंठ, रूद्र आदि। हिंदू देवी-देवताओं में भगवान शिव शंकर सबसे लोकप्रिय देवता हैं, वे देवों के देव महादेव हैं तो असुरों के राजा भी उनके उपासक रहे। आज भी दुनिया भर में हिंदू धर्म के मानने वालों के लिये भगवान शिव पूज्य हैं। माना जाता है कि जब कुछ नहीं था अर्थात सृष्टि के आरंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान ब्रह्मा के शरीर भगवान शंकर रुद्र रुप में प्रकट हुए थे। कई स्थानों पर यह भी माना जाता है कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह भी इसी दिन हुआ था। इसलिये महाशिवरात्रि Maha Shivratri हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों एवं भगवान शिव के उपासकों का एक मुख्य त्यौहार है। ऐसा भी माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा करने, व्रत रखने और रात्रि जागरण करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं एवं उपासक के हृद्य को पवित्र करते हैं। मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान शिव की सेवा में दान-पुण्य करने व शिव उपासना से उपासक को मोक्ष मिलता है। शिव जी  ही एकमात्र ऐसे  आराध्य जो लोकपरलोक दोनों मेन ही कल्याल्कारी हें ।

इनकी लोकप्रियता का कारण है इनकी सरलता। इनकी पूजा आराधना की विधि बहुत सरल मानी जाती है। माना जाता है कि शिव को यदि सच्चे मन से याद कर लिया जाये तो शिव प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी पूजा में भी ज्यादा ताम-झाम की जरुरत नहीं होती। ये केवल जलाभिषेक, बिल्वपत्रों को चढ़ाने और रात्रि भर इनका जागरण करने मात्रसे क्रपा प्राप्त होती हैं।

वैसे तो हर सप्ताह सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना का दिन माना जाता है। हर महीने में मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है लेकिन साल में शिवरात्रि का मुख्य पर्व जिसे व्यापक रुप से देश भर में मनाया जाता है दो बार आता है। एक फाल्गुन के महीने में तो दूसरा श्रावण मास में। फाल्गुन के महीने की शिवरात्रि को तो महाशिवरात्रि कहा जाता है। इसे फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु कावड़ के जरिये गंगाजल भी लेकर आते हैं जिससे भगवान शिव को स्नान करवाया जाता हैं।

महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा – Maha Shivratri ki katha

महाशिवरात्रि से जुड़ी हुई कुछ वैदिक कथाएं भी काफी प्रचलित हैं।जिनमें एक  कथा है चित्रभानु की। चित्रभानु नाम का एक शिकारी था। वह जंगल के जानवरों का शिकार कर अपना भरण-पोषण करता था। उसने एक सेठ से कर्ज ले रखा था लेकिन चुका नहीं पा रहा था  । एक दिन सेठ ने उसे शिव मठ में बंदी बना लिया संयोगवश उस दिन महाशिवरात्रि थी लेकिन इसका चित्रभानु को जरा भी ज्ञान  न था। वह तल्लीनता से शिवकथा, भजन सुनता रहा। उसके बाद सेठ ने मोहलत देकर उसे छोड़ दिया। उसके बाद वह शिकार की खोज में जंगल में निकल पड़ा। उसने एक तालाब के किनारे बिल्व वृक्ष पर अपना पड़ाव डाल दिया। उसी वृक्ष के नीचे बिल्व पत्रों से ढका हुआ एक शिवलिंग भी था। शिकार के इंतजार में वह बिल्व पत्रों को तोड़कर नीचे फेंकता रहा जो शिवलिंग पर गिरते। कुछ शिवकथा का असर कुछ अंजाने में महाशिवरात्रि के दिन वह भूखा प्यासा रहा तो उसका उपवास भी हो गया, बिल्व पत्रों के अर्पण से अंजानें में ही उससे भगवान शिव की पूजा भी हो गई इस सबसे उसका हृद्य परिवर्तन हो गया व एक के बाद एक अलग-अलग कारणों से मृगों पर उसने दया दिखलाई। इसके बाद वह शिकारी जीवन भी छोड़ देता है और अंत समय उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कहानी का निष्कर्ष है कि भगवान शिव शंकर इतने दयालु हैं कि उनकी दया से एक हिंसक शिकारी भी हिंसा का त्याग कर करुणा की साक्षात मूर्ति हो जाता है। कहानी का एक अन्य सार यह भी है कि नीति-नियम से चाहे न हो लेकिन सच्चे मन से साधारण तरीके से भी यदि भगावन शिव का स्मरण किया जाये, शिवकथा सुनी जाये तो भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और उपासक के सभी सांसारिक मनोरथ पूर्ण करते हुए कल्याण  करते हैं।

महाशिवरात्रि की वैदिक मान्यता –  Maha Shivratri Signification 

महाशिवरात्रि का उत्सव फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। पूरे देश में शिव भक्त यह पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं। पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव एक (अग्निस्तंभ ) अग्निलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। मान्यता यह भी है कि सर्वप्रथम शिवलिंग की पूजा भगवान विष्णु व ब्रह्माजी द्वारा की गई थी। देश में कई जगह इस पर्व को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इसी के तर्ज पर रात में भगवान शिव की बारात भी निकाली जाती है। भक्तगण रात में पूजा कर फलाहार करते हैं। अगले दिन सुबह सवेरे जौ, तिल, खीर, भांग, धतूरा, गन्ने की गेणी और बेल पत्र भगवान शिव को अर्पित कर अपने व्रत को खोलते हैं।

महाशिवरात्रि पर्व पर कैसे करें शिव का पूजन – Maha Shivaratri par kaise kare shiv poojan

महाशिवरात्रि के दिन सुबह से ही शिवमंदिरों में श्रद्धालुओं, उपासकों की लंबी कतारें लग जाती हैं। जल अथवा दूध से श्रद्धालु भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। गंगाजल या दूध, दही, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण से शिवलिंग को स्नान करवाया जाता है। फिर चंदन लगाकर फूल, फल,बेल पत्र  अर्पित किये जाते हैं। धूप और दीप से भगवान शिव का पूजन किया जाता है। कुछ श्रद्धालु इस दिन उपवास भी रखते हैं। महाशिवरात्रि को रात्री जागरण भी किया जाता है। कई जगहों पर भगवान शिव का विवाह किया जाता है, उनकी बारात भी निकाली जाती है। माना जाता है कि इस दिन जरुरत मंद लोगों की मदद करनी चाहिये। गाय की सेवा करने से भी इस दिन पुण्य की प्राप्ति होती है।

कहां करें शिव का पूजन – Kahan karen Maha Shivratri ka poojan

वैसे तो किसी भी शिव मंदिर में भगवान शिव की आराधना की जा सकती है। लेकिन किसी निर्जन स्थान पर बने शिव मंदिर की साफ-सफाई कर भगवान शिव की पूजा की जाये तो भगवान शिव शीघ्र मनोकामना पूरी करते हैं।

कामना के अनुसार शिव पूजा विधि – Kamna ke anusar kare Maha Shivratri ki pooja vidhi

भगवान शिव को भोलेनाथ यू ही नहीं कहा जाता। जैसा इनका नाम है वैसा ही स्वभाव भी, भगवान शिव बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देव हैं। वे कभी भी अपने किसी भी भक्त की प्रार्थना को अनदेखा नहीं करते हैं। इतना ही नहीं भगवान शिव की पूजा देवताओं द्वारा भी की जाती है। इसी लिए इन्हें देवों का देव महादेव कहा जाता है। माना जाता है कि यदि कोई जातक अपनी राशि के अनुसार भगवान शिव के विशेष मंत्रों का जाप करें, तो उसकी हर मनोकामना पूरी हो जाती है।

  • शिवरात्रि के दिन भक्तों  को गाय के घी और शहद से शिवलिंग पर अभिषेक करना चाहिए। इससे जीवनस्तर उत्तम बना रहेगा।
  • सफलता प्राप्त करने हेतु  शिवरात्रि के दिन दूध, शहद और बूरा मिलाकर शिवजी का पूजन करना चाहिए।
  • यदि आप लंबे वक्त से बीमार हैं तो उन्हें शिवलिंग पर गाय का दूध में भांग और शक्कर मिलाकर अभिषेक करना चाहिए। ऐसा करने से रोगों से छुटकारा मिल जाएगा।
  • झंझट विवादों से छुटकारा के लिये  गंगाजल में केसर, दूध और शहद मिलाकर शिवलिंग पर अभिषेक करना चाहिए। इससे लंबे वक्त से चले आ रहे है विवाद समाप्त हो जाते हैं।
  •  मुकदमें में विजय प्राप्त करने के लिए गन्ने का रस और नींबू मिलाकर शिवजी पर अर्पित करना चाहिए।
  •  शिवरात्रि के दिन घी, दही मिलाकर शिवलिंग पर अभिषेक करना चाहिए। इससे धन लाभ होगा।
  • महाशिवरात्रि के पर्व पर पंचामृत से शिवपूजन करना चाहिए इससे आपके अधूरे कार्य पूर्ण होंगे।
  •  लोगों को शिवरात्रि के दिन दूध, गाय का घी, शक्कर, केसर मिलाकर पूजन करना चाहिए। ऐसा करने से कैद से मुक्ति मिल जाती है।
  • शिवरात्रि के पावन अवसर पर आप सभी  को दही, शहद मिलाकर महादेव की पूजा करनी चाहिए। इससे संतान सुख की प्राप्ति होती है।
  • आप  यदि विरोधी को परास्त करना चाहते हैं तो उन्हें शिवरात्रि के दिन दूध, गंगाजल और शक्कर से शिवजी की पूजा करनी चाहिए।
  •  प्रमोशन और धनलाभ की प्राप्ति हेतु लोगों को बेल के रस और जल से शिवपूजन वैदिक आचार्य से कराना चाहिए।
  • यदिआप मान-सम्मान में वृद्धि करना चाहते हैं तो शिवरात्रि के दिन गंगाजल, दूध और दही से पूजा करें।

भोले नाथ के शृंगार का रहस्य – Bhole naath ke shringaar ka rahashya

ईश्वर के सगुण साकार रूप की वेशभूषा रहन सहन अद्भुत और अविश्वसनीय ही नहीं परंतु परमात्मा के साथ ऐसे विचित्र कथानक जुड़े हैं की देवी देवताओं के बारे में कल्पना करना कठिन हो जाता है शिव के स्वरूप और उनसे जुड़ी घटनाओं के दार्शनिक तत्व का विवेचन करें तो विचित्रताएं देखी जा  सकती हैं पर यह की उनका श्रृंगार सामान्य नहीं है अलंकारिक होने के साथ-साथ समाज के लिए भी हितकारी है

समुद्र मंथन के समय देवों और दानवों का द्वंद टालने के लिए भोले बाबा ने विष का पान किया था इसका सीधा संबंध योग से है। योगी पुरुष अपनी योग से शरीर पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है। जिससे उस पर बड़े तीक्ष्ण पिषपान, अपमान, कटुता, द्वेष आदि का कोई प्रभाव नहीं होता है। उन्हें वह साधारण घटनाएं मान करके पचा लेता है और लोक की सेवा करते समय उन्हें स्वार्थ का ध्यान नहीं रहता है। निर्विकार भाव से वह खुद अपमान वाला लांछओं का विषपीता है लेकिन लोगों के लिए अमृत ही लुटाता रहता है।

शिव जी ने शरीर पर भस्म में लगा रखी है। योग की पूर्णता पर योगी को संयम की सिद्धि होती है फिर उसे बाहरी अलंकारों द्वारा सौंदर्य बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहती है। योगी की ऊर्जा ही शरीर में सौंदर्य बनके फूट पड़ती है और शरीर कांतिमय में हो जाता है। इस महत्त्व की उपासना का अर्थ आपको आपके बुरे कर्मों से बचाए रखता है इस तरह की जीवन व्यवस्था व्यक्ति को असाधारण बनाती है। गृहस्थ होकर के भी पूर्ण योगी होना शिव से जुड़ा महत्वपूर्ण रहस्य संसार की व्यवस्था के लिए इस बात के लिए प्रतीक है कि घर परिवार में रहकर भी आत्म कल्याण के साथ लोक कल्याण की साधना असंभव नहीं है जीवन की पवित्रता रख कर हंसते खेलते भी जिया जा सकता है।

शिव जी की पूजा में चढ़ने योग्य पुष्प – Shiv ji ki pooja me kaun se pushp chadhaye – Maha Shivratri ke liye pushp

भगवान् शंकरपर फूल चढ़ानेका बहुत अधिक महत्त्व है । बतलाया जाता है कि तपःशील सर्वगुणसम्पन्न वेदमें निष्णात किसी ब्राह्मणको सौ सुवर्ण दान करनेपर जो फल प्राप्त होता है, वह भगवान् शंकरपर सौ फूल  चढ़ा देनेसे प्राप्त हो जाता है । कौन-कौन पत्र-पुष्प शिवके लिये विहित  हैं और कौन-कौन निषिद्ध हैं, इनकी जानकारी अपेक्षित है। अतः उनका उल्लेख यहाँ किया जाता है पहली बात यह है कि भगवान् विष्णुके लिये जो-जो पत्र और पुष्प विहित हैं, वे सब भगवान् शंकरपर भी चढ़ाये जाते हैं। केवल केतकी-केवड़ेका निषेध है।  शास्त्रोंने कुछ फूलोंके चढ़ानेसे मिलनेवाले फलका तारतम्य बतलाया है, जैसे दस सुवर्ण-मापके बराबर सुवर्ण-दानका फल एक आकके फूलको चढ़ानेसे मिल जाता है। हजार आकके फूलोंकी अपेक्षा एक बिल्व पत्रसे फल मिल जाता है और हजार बिल्वपत्रोंकी अपेक्षा एक गूमाफूल (द्रोण-पुष्प) होता है। इस तरह हजार गूमासे बढ़कर एक चिचिड़ा, हजार चिचिड़ों (अपामार्गों) से बढ़कर एक कुशका फूल, हजार  कुश-पुष्पोंसे बढ़कर एक शमीका पत्ता, हजार शमीके पत्तोंसे बढ़कर एक नीलकमल, हजार नीलकमलोंसे बढ़कर एक धतूरा, हजार धतूरोंसे  बढ़कर एक शमीका फूल होता है। अन्तमें बतलाया है कि समस्त फूलोंकी जातियोंमें सबसे बढ़कर नीलकमल होता है ।

भगवान्व्या सने कनेरकी कोटिमें चमेली, मौलसिरी, पाटला, मदार, श्वेतकमल, शमीके फूल और बड़ी भटकटैया को रखा है। इसी तरह धतूरेकी कोटिमें नागचम्पा और पुंनागको माना है। शास्त्रोंने भगवान् शंकरकी पूजामें मौलसिरी (बक-बकुल) के फूल को ही अधिक महत्त्व दिया है।

भविष्य पुराणने भगवान् शंकरपर चढ़ानेयोग्य और भी फूलोंके नाम गिनाये हैं करवीर (कनेर), मौलसिरी, धतूरा, पाढर, बड़ी कटेरी, कुरैया, कास, मन्दार, अपराजिता, शमीका फूल, कुब्जक, शंखपुष्पी, कुंद, जूही, मदन्ती, शिरीष सर्ज और दोपहरियाके फूल भगवान् शंकरपर, चिचिड़ा, कमल, चमेली, नागचम्पा’, चम्पा, खस, तगर, नागकेसर, किंकिरात (करंटक अर्थात् पीले फूलवाली कटसरैया), गूमा, शीशम, गूलर, जयन्ती, बेला, पलाश, बेलपत्ता, कुसुम्भ-पुष्प, कुङ्कुम’ अर्थात् केसर, नीलकमल और लाल कमल । जल एवं स्थलमें उत्पन्न जितने सुगन्धित फूल हैं, सभी भगवान् शंकरको प्रिय हैं।

भारत के सिद्ध ज्योतिर्लिंग – Bhaarat ke prasidhh jyotirling – Maha Shivratri par kahan darshan kare.

शिव जी की विशेष क्रपा प्राप्त करने हेतु आप शिव जी के ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने जा सकते हैं  काशी के विश्वन्नाथ मंदिर पर महाशिवरात्रि के दिन भक्तों का भारी जमावड़ा होता है और लाखों की संख्या मे महादेव के भक्त काशी की पंचक्रोशी परिक्रमा भी करते हैं। इसके अलावा भारत भर में बारह स्थानों पर 12 ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं

  • सोमनाथ– यह शिवलिंग गुजरात के कठियावाड़ में स्थापित है।
  • श्री शैल मल्लिकार्जुन यह मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है।
  • महाकाल उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग हैं माना जाता है कि यहां भगवान शिव ने दैत्यों का नाश किया था।
  • ओंकारेश्वर ममलेश्वर यह मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी के तट पर स्थित है माना जाता है कि पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदान देने के लिये स्वयं भगवान शिव यहां प्रकट हुये थे जिससे यहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग एवं ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हुआ।
  • नागेश्वर– गुजरात के द्वारकाधाम के समीप ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित है।
  • बैजनाथ यह शिवलिंग बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित है इसे भी 12 ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है।
  • भीमशंकर यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र की भीमा नदी के तट पर स्थापित है।
  • त्र्यंम्बकेश्वर– महाराष्ट्र के नासिक से 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित है यह ज्योतिर्लिंग।
  • घुमेश्वर यह ज्योतिर्लिंग भी महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित है।
  • केदारनाथ हरिद्वार से करीब 150 मील की दूरी पर दुर्गम हिमालय पर केदारनाथ ज्योतिर्लिंग स्थापित है।
  • विश्वनाथ यह बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित है इसलिये इसे विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग कहते हैं।
  • रामेश्वरम् मद्रास के त्रिचनापल्ली में समुद्र तट पर यह ज्योतिर्लिंग है। माना जाता है इसे स्वयं भगवान श्री राम ने स्थापित किया था जिस कारण इसका नाम रामेश्वरम् पड़ा।

-: महा शिवरात्रि मुहूर्त 2021 :-

महा शिवरात्रि बृहस्पतिवार, मार्च 11, 2021 को
अवधि – 00 घण्टे 48 मिनट्स 12वाँ मार्च को,
शिवरात्रि पारण समय – 06:21 ए एम से 03:02 पी एम
रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय – 06:15 पी एम से 09:17 पी एम
रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय – 09:17 पी एम से 12:18 ए एम, मार्च 12
रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय – 12:18 ए एम से 03:20 ए एम, मार्च 12
रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय – 03:20 ए एम से 06:21 ए एम, मार्च 12
चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ – मार्च 11, 2021 को 02:39 पी एम बजे
चतुर्दशी तिथि समाप्त – मार्च 12, 2021 को 03:02 पी एम बजे

वैदिक परिवार की ओर से आप समस्त पाठकों को महा शिवरात्रि के पावन पर्व की बहुत बहुत मंगलकनाए। आपका यह पर्व मंगलमय व्यतीत हो हम ऐसी कामना करते हैं। Happy Maha Shivratri

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